नई दिल्ली, 26 जनवरी (आईएएनएस)। 6 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में जन्मे कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना को केवल लेखक कह देना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे साहित्य की दुनिया में एक जीवंत आंदोलन थे, दूरदृष्टि से भरे चिंतक थे और भारतीय टेलीविजन में रचनात्मक क्रांति की नींव रखने वालों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्व थे।
कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना का बचपन उस दौर में बीता जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। मैनपुरी के ग्रामीण परिवेश ने उन्हें मिट्टी की सोंधी खुशबू और समाज की कड़वी सच्चाई, दोनों से रूबरू कराया। 1948 में उनकी पहली कहानी 'कामरेड' छपी, जिसने साफ कर दिया कि यह युवा लेखक केवल शब्दों से खेलने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था से टकराने के लिए पैदा हुआ है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय (अब प्रयागराज) उनके लिए 'साहित्य का मक्का' साबित हुआ, जहां निराला और पंत जैसे दिग्गजों की छाया में कमलेश्वर ने 'बदनाम गली' जैसा उपन्यास लिखकर अपनी धमक दर्ज कराई। एक प्रूफरीडर के तौर पर करियर शुरू करने वाले इस शख्स को क्या मालूम था कि एक दिन वह पूरे देश की 'पटकथा' लिखेगा।
1950 के दशक में जब साहित्य आदर्शवाद के बोझ तले दबा था, तब कमलेश्वर ने मोहन राकेश और राजेंद्र यादव के साथ मिलकर 'नई कहानी' का बिगुल फूंका। उन्होंने कहानी को ड्राइंग रूम से निकालकर उस आम आदमी के पास पहुंचाया जो महानगरों की भीड़ में खुद को खोया हुआ महसूस कर रहा था।
उनकी कालजयी कहानी 'राजा निरबंसिया' (1957) ने साबित किया कि आधुनिकता की चकाचौंध के पीछे पुराने अंधविश्वास आज भी इंसान को भीतर से खोखला कर रहे हैं। 'कस्बे का आदमी' और 'खोई हुई दिशाएं' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के 'अजनबीपन' को स्वर दिया।
कमलेश्वर ने पत्रकारिता को कभी केवल खबर नहीं माना। 1967 में जब उन्होंने 'सारिका' की कमान संभाली, तो उन्होंने इसे हाशिए के लोगों की आवाज बना दिया। 'सामानांतर कहानी' आंदोलन के जरिए उन्होंने लेखकों को 'सहयात्री' कहा। उन्होंने न केवल हिंदी, बल्कि मराठी दलित साहित्य और मुस्लिम समाज के लेखकों को वह मंच दिया जो उन्हें अब तक नहीं मिला था। दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे अखबारों के संपादन के दौरान उनकी पैनी दृष्टि समाज के हर वर्ग पर रही।
जब कमलेश्वर मुंबई पहुंचे, तो उन्होंने सिनेमा की भाषा बदल दी। उन्होंने लगभग 100 फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखे। गुलजार की फिल्म 'आंधी' हो या बसु चटर्जी की 'छोटी सी बात,' कमलेश्वर के लिखे पटकथा किरदारों में एक ऐसी गहराई थी जो आम दर्शकों को भी 'बुद्धिजीवी' बना देती थी।
'मौसम' की संवेदनशीलता, 'रजनीगंधा' का मध्यमवर्गीय रोमांस और 'मिस्टर नटवरलाल' जैसी मसाला फिल्मों में भी उन्होंने अपनी लेखनी की धार को कम नहीं होने दिया। उन्होंने दिखाया कि साहित्य और सिनेमा एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।
1980 के दशक में दूरदर्शन के 'अतिरिक्त महानिदेशक' के रूप में कमलेश्वर ने भारतीय घरों में क्रांति ला दी। 'हम लोग' जैसा भारत का पहला सोप ओपेरा उन्हीं के विजन का परिणाम था। उन्होंने 'एजुटेनमेंट' के जरिए परिवार नियोजन और महिला सशक्तीकरण जैसे गंभीर मुद्दों को मनोरंजन के साथ परोसा। 'परिक्रमा' और 'दर्पण' जैसे कार्यक्रमों ने टीवी को केवल मनोरंजन का डब्बा नहीं, बल्कि ज्ञान का झरोखा बना दिया। 'चंद्रकांता' के तिलिस्म को परदे पर उतारने का श्रेय भी उन्हीं के जादुई कलम को जाता है।
'कितने पाकिस्तान' (2000) उपन्यास उनके जीवन का शिखर था। इसमें कमलेश्वर ने साहित्यकार की ऐसी अदालत लगाई जहां इतिहास के पन्ने खुद गवाही देते हैं। उनके लिए पाकिस्तान सिर्फ एक मुल्क नहीं था, बल्कि वह 'नफरत की मानसिकता' थी जो धर्म और जाति के नाम पर इंसानों को बांटती है। 2003 में इस कृति के लिए उन्हें 'साहित्य अकादमी' और 2005 में 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया।
कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना 27 जनवरी 2007 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
--आईएएनएस
वीकेयू/एएस