कल्याण सिंह: सत्ता, संघर्ष और सियासत की नैतिकता का नाम

कल्याण सिंह: सत्ता, संघर्ष और सियासत की नैतिकता का नाम

नई दिल्ली, 4 जनवरी (आईएएनएस)। 5 जनवरी 1932, यही वह तारीख है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति को दशकों तक दिशा देने वाले, 'बाबूजी' के नाम से पहचाने जाने वाले कल्याण सिंह का जन्म हुआ। अलीगढ़ जिले के मढ़ौली गांव में तेजपाल सिंह लोधी और सीता देवी के घर जन्मे कल्याण सिंह ने राजनीति में जो सफर तय किया, वह सिर्फ सत्ता का नहीं बल्कि सिद्धांत, टकराव और फैसलों की जिम्मेदारी उठाने का भी इतिहास है।

लगभग तीन दशक पहले अयोध्या में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कल्याण सिंह एक प्रमुख हिंदू नेता के तौर पर उभरे। यह वही दौर था, जब उनका नाम देश की राजनीति के केंद्र में आ गया। 6 दिसंबर 1992 की उस घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया।

राजनीति में आने में पहले उनका करियर एक अध्यापक के तौर पर शुरू हुआ था। बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने समाजसेवा की राह पकड़ी और यहीं से उनकी राजनीति की शुरुआत हुई। जनसंघ के मंच से सक्रिय राजनीति में कदम रखने वाले कल्याण सिंह 1967 में पहली बार अलीगढ़ की अतरौली सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद 2002 तक वह दस बार विधानसभा सदस्य रहे।

आपातकाल के दौरान वह 20 महीने जेल में रहे। 1977 में मुख्यमंत्री राम नरेश यादव के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी सरकार में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। यहीं से उनकी प्रशासनिक समझ व राजनीतिक पकड़ और मजबूत हुई। 1990 के दशक में कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के नायक के रूप में उभरे। 1991 का विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया और पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा की सरकार बनी। जून 1991 में वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

हालांकि, 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद उन्होंने उसी दिन मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उस दिन पूरा देश हिल गया था। लखनऊ से दिल्ली तक फोन की घंटियां बज रही थीं और हर कोई यह जानना चाहता था कि अयोध्या में यह सब अचानक कैसे हो गया। बताया जाता है कि जब अयोध्या में घटनाक्रम चल रहा था, तब मुख्यमंत्री कल्याण सिंह लखनऊ स्थित अपने सरकारी आवास पर थे। बाद में उन्होंने इस घटना की पूरी जिम्मेदारी खुद ली।

लेखक हेमंत शर्मा अपनी किताब 'अयोध्या के चश्मदीद' में बताते हैं कि कल्याण सिंह ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी कीमत पर कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई जाए। उनके अनुसार, कल्याण सिंह ने कहा था कि मैं इसकी जिम्मेदारी खुद लेता हूं। विवादित ढांचे पर मौजूद कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई गई तो इसकी जिम्मेदारी किसी अधिकारी की नहीं है। मैंने लिखित आदेश दिया था कि किसी पर भी गोली नहीं चलाई जाए।

हेमंत शर्मा की ही किताब 'युद्ध में अयोध्या' के अनुसार, 6 दिसंबर 1992 की सुबह से ही कारसेवा स्थल के पास विहिप और भाजपा नेताओं के भाषण चल रहे थे। उसी सुबह मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने दो बार फैजाबाद कमिश्नर को फोन कर स्थिति की जानकारी ली थी। जब उन्हें ढांचा गिरने की खबर मिली, तो उन्होंने विनय कटियार के घर फोन किया और आडवाणी से इस्तीफे की बात कही, हालांकि आडवाणी ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी थी। अयोध्या के बाद कल्याण सिंह की छवि एक हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित हुई।

कल्याण सिंह 1997 में दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह कार्यकाल महज दो साल का रहा। इसके बाद वह राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। समय के साथ उनका भाजपा से मोहभंग भी हुआ। मतभेदों के चलते उन्होंने भाजपा छोड़कर अपनी पार्टी बनाई। जनवरी 2004 में वह भाजपा में लौटे, लेकिन 2009 में उपेक्षा और अपमान का आरोप लगाते हुए पार्टी की सदस्यता से फिर इस्तीफा दे दिया। लोग उन्हें प्यार से 'बाबूजी' कहते थे।

सितंबर 2019 में उन पर विवादित ढांचे को ध्वस्त करने की आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमा चला। 2020 में सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। 21 अगस्त 2021 को लखनऊ में उनका निधन हो गया। उनके निधन के एक साल बाद, 2022 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

--आईएएनएस

पीएसके/एएस