गांधीनगर, 26 मई (आईएएनएस)। कभी-कभी किसी संवेदनशील व्यक्ति के जीवन में घटित कोई घटना उसके पूरे जीवन को बदल देती है और फिर वह कुछ ऐसा करता है, जो दूसरों के लिए प्रेरणादायी बन जाता है। सूरत जिले की ओलपाड तहसील के सरस गांव के किसान कल्पेश पटेल के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
कल्पेश पटेल सूरत स्थित फैक्ट्री में केमिकल ऑपरेटर के रूप में नौकरी करते हैं। उनके पिता रमणभाई पटेल की कैंसर से मौत होने के बाद कल्पेश पटेल के जीवन में एक नया मोड़ आया। पिता की कैंसर से मौत के बाद उन्होंने तय किया कि वह अपने खेत में अब कभी रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करेंगे। जहरीले कीटनाशकों को छोड़कर कल्पेश पटेल ने प्राकृतिक खेती अपना ली।
स्वभाव से प्रकृति प्रेमी कल्पेश पटेल ने 2019 से प्राकृतिक खेती का राह चुनी। उन्होंने गुजरात सरकार के कृषि विभाग की ओर से दी जाने वाली प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया और प्राकृतिक खेती के लिए जीवामृत बनाना सीखा। इस प्रकार, उन्होंने जीवन में एक नई शुरुआत की।
कल्पेश पटेल को विरासत में करीब आठ बीघा जमीन मिली है। उन्होंने साढ़े तीन बीघा जमीन पर केले की 50 से अधिक किस्में उगाई हैं, जिनमें पूवन, आधापुरी, रस्थली, लाल केळ, ब्लू जावा, बरराई, महालक्ष्मी और इलायची केला आदि शामिल हैं।
केले की विभिन्न किस्मों के साथ-साथ उन्होंने उत्पादन में भी रिकॉर्ड बनाया है। वर्ष 2025 में उनके खेत में केले के एक गुच्छे का वजन 73 किलो था। आम तौर पर केले के एक गुच्छे का वजन 20 से 30 किलो के आसपास होता है। लेकिन, कल्पेश पटेल की बाड़ी में केले के गुच्छे का औसत वजन 30 किलो से अधिक होता है।
कल्पेश पटेल ने प्राकृतिक खेती की ओर मुड़ने की वजह का खुलासा करते हुए कहा, “जब मेरे पिताजी को कैंसर हुआ, तभी मेरे मन में यह विचार आया कि अब रासायनिक खाद के जहर से मुक्त होना पड़ेगा और धरती माता को भी इस जहर से मुक्त करना है। प्राकृतिक खेती की ओर मुड़ना होगा। जब पिताजी खेती करते थे, तब वे खेत में बहुत अधिक कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करते थे और उनके पूरे शरीर से उस दवा की दुर्गंध आती थी। चूंकि मैं खेती से जुड़ा नहीं था, इसलिए उन्हें कुछ कहता भी नहीं था। लेकिन, जब उन्हें कैंसर हुआ और बाद में उनका निधन हुआ, तो इससे मेरे जीवन में एक नया मोड़ आ गया।”
प्राकृतिक खेती के फायदे बताते हुए कल्पेश पटेल ने कहा, “मैं पिछले सात वर्षों से प्राकृतिक खेती कर रहा हूं। मैंने ‘जंगल मॉडल’ भी अपनाया है। मैं अपने खेत उत्पादों में वैल्यू एडिशन करता हूं और ‘मेरा माल, मेरा भाव’ के सिद्धांत से खेती और उपज की बिक्री करता हूं। प्राकृतिक खेती के कारण प्रति बीघा जमीन पर होने वाला 15 से 20 हजार रुपए का रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों का खर्च बंद हो गया है। यही नहीं, मिट्टी की सेहत सुधरने से केले का बंपर उत्पादन होने लगा है। सालाना साढ़े तीन बीघा के खेत में केले की खेती से 10 से 12 लाख रुपए की आय होती है।”
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों से रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती अपनाने और रासायनिक खाद के विकल्प के तौर पर जैविक खाद अपनाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की अपील की है।
राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य में प्राकृतिक खेती को एक नई रफ्तार मिली है। किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों को छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर मोड़ने के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत सहायता दी जाती है। राज्य के माननीय राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत भी गांव-गांव जाकर किसानों को प्राकृतिक कृषि की दिशा में मोड़ने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं।
गुजरात सरकार ने प्राकृतिक खेत उत्पादों की बिक्री के लिए एक प्रयोग शुरू किया है। गुजरात के विभिन्न शहरों में प्राकृतिक कृषि बाजार बनाए हैं, जहां प्राकृतिक खेती करने वाले किसान अपने उत्पाद बेच सकते हैं। कल्पेश पटेल सूरत के वेसू स्थित कृषि बाजार में केला और अन्य उत्पाद बेचते हैं। इतना ही नहीं, यदि कच्चे केले नहीं बिक पाते, तो कल्पेश उन केलों से वेफर और पाउडर जैसे उत्पाद बनाते हैं, जिससे वैल्यू एडिशन के जरिए उनकी आय बढ़ जाती है।
कल्पेश पटेल के केले की प्राकृतिक खेती का संदेश देश भर में पहुंच गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उनके साथ वार्तालाप किया और कल्पेश पटेल की सफलता की कहानी को अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया। कल्पेश को दूसरे राज्यों से भी ऑर्डर मिलते हैं, जिन्हें वे पार्सल के जरिए संबंधित राज्य में भेजते हैं।
--आईएएनएस
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