नई दिल्ली, 11 मार्च (आईएएनएस)। शरीर के बाकी सभी अंगों की तरह कान भी हमारे शरीर का सबसे जरूरी अंग है जो न सिर्फ सुनने में सहायता करता है बल्कि शरीर के संतुलन को भी बनाए रखने में मदद करता है।
कान की स्वच्छता को लेकर लोग आमतौर पर ज्यादा गंभीर नहीं होते हैं, जब तक उसमें दर्द न हो। कान से कभी पीला, सफेद, या पानी जैसा तरल पदार्थ निकलता है, जिसे नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन यह साधारण नहीं बल्कि संक्रमण का भी संकेत हो सकता है।
कान से कभी पीला, सफेद, या पानी जैसा तरल पदार्थ निकलने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। यह कानों में बैक्टीरिया या वायरस के संक्रमण, कान का पर्दा फटने, कान में चोट आने, फंगल संक्रमण, कान में फुंसी हो जाने, या गले में संक्रमण के कारण भी हो सकता है। अगर कान से हल्का लाल पानी या फिर दर्द की शिकायत है, तो तुरंत चिकित्सक से सलाह लें। थोड़ी सी लापरवाही भी कानों को क्षति पहुंचा सकती है।
आयुर्वेद में कानों से बहने वाले तरह के पदार्थ और संक्रमण को रोकने के लिए कई उपाय बताए गए हैं, लेकिन यह तभी कारगर है जब लक्षण गंभीर न हों। इसके लिए लहसुन के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। लहसुन में प्राकृतिक एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं। इसे बनाने के लिए सरसों के तेल में लहसुन की कलियों को पका लें और फिर छान कर अलग निकाल लें। हल्का गुनगुना होने पर कानों में दो बूंद डालें। इससे दर्द और तरल पदार्थ दोनों से आराम मिलेगा।
तुलसी का रस भी संक्रमण से बचाने में मदद करता है। इसे कानों में सीधा नहीं डालना होता है; इसे कान के आसपास के हिस्से में लगाना होता है। इसके अलावा, नीम का तेल भी एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरा होता है। इसे भी कान के बाहरी हिस्से में लगाने से संक्रमण कम होता है।
कान में दर्द और संक्रमण होने पर हल्दी के दूध का सेवन भी लाभकारी होता है। यह दर्द को कम करने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। नियमित भी हल्दी के दूध का इस्तेमाल किया जा सकता है। आयुर्वेद में कान में संक्रमण के रोग को कफ और पित्त दोष से जोड़कर देखा गया है। शरीर में कफ और पित्त दोष की अधिकता से कान में दर्द की संभावना बढ़ जाती है।
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