'जी हां हुजूर, मैं गीत बेचता हूं’, जब एक कवि ने खुद को गीतफरोश कहा और अमर हो गया, कहानी 'कविता के गांधी' भवानी प्रसाद मिश्र की

'जी हां हुजूर, मैं गीत बेचता हूं’, जब एक कवि ने खुद को गीत-फरोश कहा और अमर हो गया, कहानी 'कविता के गांधी' भवानी प्रसाद मिश्र की

नई दिल्ली, 28 मार्च (आईएएनएस)। सहज लेखन और सहज व्यक्तित्व का नाम है, भवानी प्रसाद मिश्र। कविता और साहित्य के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन में जिन कवियों की सक्रिय भागीदारी थी, उनमें भवानी प्रसाद मिश्र भी प्रमुख थे। गांधीवाद पर आस्था रखने वाले मिश्र की कविताएं हिंदी की सहज लय की कविताएं हैं। इस सहजता का संबंध महात्मा गांधी के चरखे की लय से भी जुड़ता है, इसीलिए उन्हें 'कविता का गांधी' भी कहा गया।

29 मार्च 1913 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के टिगरिया में जन्मे भवानी प्रसाद मिश्र जिस किसी विषय को उठाते, उसे घरेलू बना लेते। 'आंगन का पौधा', 'शाम और दूर दिखती पहाड़ की नीली चोटी' भी जैसे परिवार का एक अंग हो जाती है। वृद्धावस्था और मृत्यु के प्रति भी एक आत्मीय स्वर मिलता है। उन्होंने प्रौढ़ प्रेम की कविताएं भी लिखी, जिनमें सहजीवन के सुख-दुख और प्रेम की व्यंजना है।

1930 में उन्होंने लिखा, 'जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख, और उसके बाद ही हमसे बड़ा तू दिख।' यह भवानी प्रसाद मिश्र की ओर से रचित एक प्रसिद्ध कविता के बोल हैं, जो साहित्य में सहजता, बोलचाल की भाषा और सादगी की वकालत करते हैं।

"बहुत पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है, घर कि मुझसे दूर है जो, घर खुशी का पूर है जो। घर कि घर में चार भाई, मायके में बहिन आई, बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर। घर कि घर में सब जुड़े हैं, सब कि इतने कब जुड़े हैं, चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें।"

'घर की याद' कविता में घर के मर्म का उद्घाटन है। कवि को जेल-प्रवास के दौरान घर से विस्थापन की पीड़ा सालती है। कवि के स्मृति-संसार में उसके परिजन एक-एक कर शामिल होते चले जाते हैं। घर की अवधारणा की सार्थक और मार्मिक याद कविता की केंद्रीय संवेदना है।

"तो पहले अपना नाम बता दूं तुमको, फिर चुपके-चुपके धाम बता दूं तुमको। तुम चौंक नहीं पड़ना, यदि धीमे-धीमे अपना कोई काम बता दूं तुमको।"

भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'सन्नाटा' को पढ़ते हुए एक इंटरव्यू में अभिनेता सौरभ शुक्ला कहते हैं, "मैंने थिएटर के दिनों में उनकी कविता को सुना था। यह कविता मेरे जहन में पूरी तरह से अंकित हो गई। फिर मैं यह कविता ढूंढ नहीं पाया। हालांकि शुरू की चार लाइनें मुझे हमेशा याद रहती हैं और अक्सर उन्हीं चार लाइनों को लोगों को मैं सुनाया करता था। एक बार जब कविता का जिक्र उठा तो मैंने कहा कि मुझे सन्नाटा कविता लाकर दो और फिर यह कविता मेरे पास तक आई। शूटिंग के दौरान वाद-विवाद में मैं लोगों को पकड़ यही कविता सुनाता हूं। पहले वे लोग सुनते हैं, लेकिन बाद में वे उसी में खो जाते हैं, क्योंकि इस कविता में कहानी है।"

वे आगे कहते हैं, "यह एक ऐसी कविता है जो मुझे मेरे वर्तमान से निकालकर जहां मैं खड़ा हूं, कहीं और एक अलग दुनिया में ले जाती है। यही इस कविता की बहुत बड़ी खासियत है।"

"जी हां हुजूर, मैं गीत बेचता हूं, मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूं। मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं।"

भवानी प्रसाद मिश्र की यह कविता भी काफी प्रसिद्ध हुई। यह उनके प्रथम संग्रह 'गीत-फरोश' (1956) में प्रकाशित हुई थी। इसके बारे में अभिनेता अमिताभ बच्चन ने एक शो में कहा था, "जब भी वे (भवानी प्रसाद मिश्र) हमारे घर आते थे, तब हम बार-बार कहते थे कि भवानी भाई एक बार यह कविता सुना दीजिए।"

गांधीवाद पर आस्था रखने के कारण उन्होंने अहिंसा और सहनशीलता को रचनात्मक अभिव्यक्ति दी। वे युवा जीवन में ही महात्मा गांधी के प्रभाव में आए, तो एक विद्यालय खोल अध्यापन कराने लगे। 1943 में तीन सालों की जेल की सजा भी पाई। 33 की आयु से खादी पहनने लगे। गांधी वांग्मय के हिंदी खंडों का संपादन किया और फिर गांधी विचार-दर्शन से ओतप्रोत 500 कविताओं का 'गांधी पंचशती' शीर्षक से संकलन किया। उनकी कविताओं के सहज लय का साम्य चरखे की लय से करते हुए उन्हें 'कविता का गांधी' कहा गया।

--आईएएनएस

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