नई दिल्ली, 25 सितंबर (आईएएनएस)। इस साल जब 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' पूरा गाया गया तो वह ऐतिहासिक क्षण था और पूरे देश ने गर्व का एहसास किया। इसी तरह 25 सितंबर को एक नया रिकॉर्ड स्थापित करने के लिए 'नमामि भारतम्' कार्यक्रम के तहत देशभर में संपूर्ण वंदे मातरम का सामूहिक गायन हुआ है। इसके तहत एक करोड़ से अधिक छात्र, शिक्षक, अभिभावक और नागरिकों की ओर से संपूर्ण वंदे मातरम के सामूहिक गायन का लक्ष्य रहा।
वंदे मातरम के महत्व को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक मूल को जानना बहुत जरूरी है। यह एक ऐसा मार्ग है, जो साहित्य, राष्ट्रवाद और भारत के स्वाधीनता संग्राम को जोड़ता है। इस स्तुति गान का एक कविता से राष्ट्रीय गीत बनने तक का सफर, औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत की सामूहिक जागृति का उदाहरण है।
यह गीत पहली बार 1875 में प्रकाशित हुआ। इस तथ्य की पुष्टि श्री अरबिंदो की ओर से 16 अप्रैल 1907 को अंग्रेजी दैनिक 'बंदे मातरम' में लिखे एक लेख से होती है, जिसमें इस बात का उल्लेख है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने मशहूर गीत की रचना 32 साल पहले की थी। उन्होंने कहा कि उस समय बहुत कम लोगों ने इसे सुना था, लेकिन लंबे समय के भ्रम से जागृत होने के एक पल में, बंगाल के लोगों ने सच्चाई की तलाश की और उसी नियत क्षण में किसी ने 'वंदे मातरम' गाया।
बंकिम चंद्र, 19वीं सदी के बंगाल की सबसे जानी-मानी हस्तियों में से एक थे। 19वीं सदी के दौरान बंगाल के बौद्धिक और साहित्यिक इतिहास में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। एक जाने-माने उपन्यासकार, कवि और निबंधकार के तौर पर उनके योगदान ने आधुनिक बंगाली गद्य के विकास और उभरते भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला।
वंदे मातरम की रचना को राष्ट्रवादी चिंतन में मील का पत्थर माना जाता है, जो मातृभूमि के प्रति भक्ति और आध्यात्मिक आदर्शवाद के मेल का प्रतीक है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी लेखनी के जरिए, न केवल बंगाली साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारत के शुरुआती राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए बुनियादी वैचारिक सिद्धांत भी रखे। वंदे मातरम में उन्होंने देश को मातृभूमि को मां के रूप में देखने का नजरिया दिया।
बाद में, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपने कालजयी उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया, जिसका प्रकाशन वर्ष 1882 में हुआ था। पुस्तक के रूप में सामने आने से पहले, यह उपन्यास बंगाली मासिक पत्रिका 'बंगदर्शन' में प्रकाशित हुआ था।
उपन्यास 'आनंदमठ' का मूल कथानक संन्यासियों के एक ऐसे समूह के इर्द-गिर्द घूमता है, जिन्हें 'संतान' (अर्थात भारत माता की संतान) कहा गया है। ये संन्यासी अपनी मातृभूमि के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं और देश को देवी मां के रूप में पूजते हैं। मातृभूमि के प्रति उनका अनुराग और भक्ति सर्वोपरि है। प्रसिद्ध राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' इसी उपन्यास में इन संतानों द्वारा गाया गया मुख्य गीत है, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र बना।
1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम गाया था। प्रमथनाथ मित्र और सतीश चंद्र बसु ने 1902 में स्थापित अनुशीलन समिति के सदस्यों के बीच वंदे मातरम का विशेष स्थान था। इसके प्रशिक्षित शिविरों की शुरुआत और समाप्ति वंदे मातरम के साथ ही होती थी।
भारत सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय के अनुसार, राजनीतिक नारे के तौर पर वंदे मातरम का सबसे पहले इस्तेमाल 7 अगस्त 1905 को हुआ था, जब सभी समुदाय के हजारों छात्रों ने कलकत्ता (आज कोलकाता) में टाउन हॉल की तरफ जुलूस निकालते हुए वंदे मातरम और दूसरे नारों से आसमान गूंजा दिया था। वहां एक बड़ी ऐतिहासिक सभा में, विदेशी सामानों के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने के प्रसिद्ध प्रस्ताव को पास किया गया, जिसने बंगाल के बंटवारे के खिलाफ आंदोलन का संकेत दिया। इसके बाद बंगाल में जो घटनाएं हुईं, उन्होंने पूरे देश में जोश भर दिया।
अक्टूबर 1905 में, उत्तरी कलकत्ता में मातृभूमि को एक मिशन और धार्मिक जुनून के तौर पर बढ़ावा देने के लिए एक 'बंदे मातरम संप्रदाय' की स्थापना की गई थी। इस संप्रदाय के सदस्य हर रविवार को 'वंदे मातरम' गाते हुए प्रभात फेरियां निकालते थे और मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्वैच्छिक दान भी लेते थे। इस संप्रदाय की प्रभात फेरियों में कभी-कभी रवींद्रनाथ टैगोर भी शामिल होते थे।
नवंबर 1905 में, बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से हर एक पर 5-5 रुपए का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि वे वंदे मातरम गाने के दोषी थे। रंगपुर में, बंटवारे का विरोध करने वाले जाने-माने नेताओं को स्पेशल कांस्टेबल के तौर पर काम करने और वंदे मातरम गाने से रोकने का निर्देश दिया गया।
20 मई 1906 को, बारीसाल (जो अब बांग्लादेश में है) में एक अभूतपूर्व वंदे मातरम जुलूस निकाला गया, जिसमें दस हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। हिंदू और मुसलमान दोनों ही शहर की मुख्य सड़कों पर वंदे मातरम के झंडे लेकर मार्च कर रहे थे। इसी साल नवंबर में, महाराष्ट्र के धुलिया में हुई एक विशाल सभा में वंदे मातरम के नारे लगाए गए। 1908 में, बेलगाम (कर्नाटक) में, जिस दिन लोकमान्य तिलक को बर्मा के मांडले भेजा जा रहा था, वंदे मातरम गाने के खिलाफ एक मौखिक आदेश जारी किया गया था। आदेश का पालन न करने पर पुलिस ने कई युवाओं को पीटा और कई लोगों को गिरफ्तार किया।
1907 में, मैडम भीकाजी कामा ने पहली बार भारत के बाहर स्टटगार्ट, बर्लिन में तिरंगा झंडा फहराया था। उस झंडे पर वंदे मातरम लिखा हुआ था। 17 अगस्त 1909 को, जब मदन लाल ढींगरा को इंग्लैंड में फांसी दी गई, तो फांसी पर चढ़ने से पहले उनके आखिरी शब्द थे 'वंदे मातरम।' फिर 1909 में, पेरिस में भारतीय देशभक्तों ने जिनेवा से 'वंदे मातरम' नामक एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अक्टूबर 1912 में, जब गोपाल कृष्ण गोखले केप टाउन, दक्षिण अफ्रीका पहुंचे, तो उनका स्वागत 'वंदे मातरम' के नारे लगाते लोगों के एक बड़े जुलूस के साथ किया गया।
इस तरह 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में 'वंदे मातरम' बढ़ते भारतीय राष्ट्रवाद का नारा बन गया। इसे सुनते ही देश के वीर सपूतों की रगों में देशभक्ति का ज्वार उमड़ पड़ता था।
स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों ने अपनी सभाओं और संगठनों में वंदे मातरम के जयघोष को अंग्रेजों के खिलाफ युद्धघोष बना दिया। क्रांतिकारी वंदे मातरम का नारा लगाते हुए जेल गए और विरोध प्रदर्शनों में अंग्रेजों का सामना भी वंदे मातरम के गायन के साथ किया, जिससे यह स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण बन गया। फांसी के तख्ते से लेकर गुप्त बैठकों तक यह नारा क्रांतिकारियों के लबों पर रहता था। जिन क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन न्योछावर किया, उनके लिए वंदे मातरम प्रेरणा और संकल्प का अमर मंत्र बना रहा।
इसके बावजूद एक दौर ऐसा आया, जब देश की आजादी से पहले ही 'वंदे मातरम' को अपने विभाजन का सामना करना पड़ा। आजादी की नींव नहीं पड़ी थी, उससे पहले सांप्रदायिक तनाव उभरने लगा था। वंदे मातरम के विरोध में स्वर दिसंबर 1908 में उठने शुरू हो चुके थे, जब मुस्लिम लीग के दूसरे अधिवेशन में अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने कहा था, "जब एक प्रांत वंदे मातरम जैसे सांप्रदायिक नारे को राष्ट्रीय नारा बताता है, तब यह साफ हो जाता है कि राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।'
बाद में मोहम्मद अली जिन्ना ने भी अपने लेखों में इसी बात को रखा। एक मार्च 1938 को 'द न्यू टाइम्स ऑफ लाहौर' में जिन्ना ने लिखा कि 'भारत के मुसलमान वंदे मातरम या इसके किसी परिवर्तित रूप को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि यह गीत मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ है।"
बाद में टैगोर ने उत्तर दिया और स्पष्ट किया कि गीत के पहले दो छंद किसी धार्मिक देवी-देवता से संबंधित नहीं हैं, बल्कि सिर्फ मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन करते हैं। हालांकि, संपूर्ण वंदे मातरम के तीसरे और चौथे छंद में देवी दुर्गा का उल्लेख आता है। यहां मातृभूमि को देवी दुर्गा के रूप में पूजने का विचार सामने रखा गया है।
यही वह बिंदू था, जहां मुस्लिम समुदाय की असहमति शुरू हुई थी। इतिहास में यह उल्लेख भी मिलता है कि 1923 में जब मोहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस की अध्यक्षता संभाली, तो संपूर्ण वंदे मातरम के गायन के तुरंत बाद वह बैठक से निकल गए थे। हालांकि, 1937 से पहले तक वंदे मातरम के सभी 6 छंद क्रांति के तराने बने रहे, जब तक कांग्रेस ने दो छंदों को हटाने का फैसला नहीं लिया।
वर्ष 1937 में कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि तत्कालीन परिस्थितियों में नेहरू जी पर मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग का भारी दबाव था, जिसके कारण उन्होंने 'वंदे मातरम' को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया। दूसरी ओर, इस विषय पर कांग्रेस का तर्क है कि 1937 के उस ऐतिहासिक प्रस्ताव में, जिसके तहत राष्ट्रीय आयोजनों में 'वंदे मातरम' के केवल शुरुआती दो पदों को ही गाने की अनुशंसा की गई थी, स्वतंत्रता संग्राम के कई शीर्ष नेताओं की सर्वसम्मत और सुविचारित राय शामिल थी।
भाजपा आरोप लगाती रही है कि 1937 के प्रस्ताव का हवाला देकर कांग्रेस ने 'वंदे मातरम्' के सिर्फ दो छंद गाने का निर्णय लिया। भाजपा का यह भी आरोप है कि 1937 में तुष्टिकरण की राजनीति के तहत 'वंदे मातरम' को दो हिस्सों में बांटने के कांग्रेस के फैसले ने दो-राष्ट्र सिद्धांत को बल दिया और अंततः देश का विभाजन हुआ।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार, 14 और 15 अगस्त 1947 की रात स्वतंत्र भारत की पहली संविधान सभा 'वंदे मातरम' गीत के साथ ही शुरू हुई थी, क्योंकि तब तक राष्ट्रगान के रूप में 'जन-गण-मन' अंगीकार नहीं हुआ था।
संविधान सभा में 'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' दोनों को राष्ट्रीय प्रतीकों के रूप में अपनाने पर पूर्ण सहमति थी और इस मुद्दे पर कोई बहस नहीं हुई।
24 जनवरी 1950 को राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण, वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समान दर्जा दिया जाना चाहिए और समान रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'एक मामला है जिस पर चर्चा होनी बाकी है, वह है राष्ट्रगान का सवाल। एक समय सोचा गया था कि यह मामला सदन के सामने लाया जाए और सदन एक प्रस्ताव पास करके इस पर फैसला ले। लेकिन ऐसा महसूस हुआ कि प्रस्ताव के जरिए औपचारिक फैसला लेने के बजाय, बेहतर होगा कि मैं राष्ट्र गान के बारे में एक बयान दूं। इसलिए मैं यह बयान दे रहा हूं।"
उन्होंने आगे कहा था, "'जन गण मन' नाम के शब्दों और संगीत से बनी रचना भारत का राष्ट्रगान है, जिसमें सरकार जरूरत पड़ने पर शब्दों में बदलाव कर सकती है और वंदे मातरम गीत, जिसने भारत के स्वाधीनता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा और उसका दर्जा भी उसके बराबर होगा। मुझे आशा है कि इससे सदस्य संतुष्ट होंगे।"
उनके बयान को अपनाया गया और रवींद्रनाथ टैगोर के 'जन-गण-मन' को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगान और बंकिम के 'वंदे मातरम' को 'जन-गण-मन' के बराबर दर्जा देते हुए राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया। हालांकि, देश की आजादी के बाद वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत तो बना, लेकिन उसके दो छंद कई दशकों तक नहीं गाए गए।
वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' लेकर आई, जो राष्ट्रीय गीत को वही कानूनी संरक्षण प्रदान करता है जो वर्तमान में राष्ट्रीय गान जन गण मन को प्राप्त है। वहीं, 2026 में केंद्र सरकार के नए दिशानिर्देशों और प्रोटोकॉल के तहत लगभग 88 वर्षों के अंतराल के बाद सभी छह पदों (पूर्ण संस्करण) के गायन की परंपरा को फिर से जोड़ा गया।
इसी साल 15 अगस्त को भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से पहली बार राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' का पूरा और सामूहिक गायन किया गया।
--आईएएनएस
डीसीएच/एएस