जब लच्छू महाराज ने ठुकराया पद्मश्री, बोले- 'दर्शकों का प्यार ही सबसे बड़ा सम्मान'

जब लच्छू महाराज ने ठुकराया पद्मश्री, बोले- 'दर्शकों का प्यार ही सबसे बड़ा सम्मान'

मुंबई, 15 अक्टूबर (आईएएनएस)। तबले की थाप पर लोगों को झूमने पर मजबूर कर देने वाले पंडित लच्छू महाराज ने अपनी जिंदगी में नाम और शोहरत तो खूब कमाई, लेकिन उनके लिए सबसे जरूरी चीज दर्शकों का प्यार था। वह उन कलाकारों में शामिल थे, जो अपनी कला को किसी पुरस्कार या सम्मान से बड़ा मानते थे। यही वजह थी कि जब सरकार ने उन्हें पद्मश्री देने का फैसला किया, तो उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

उनका मानना था कि किसी कलाकार के लिए दर्शकों की तालियां ही सबसे बड़ा पुरस्कार हैं।

लच्छू महाराज का असली नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था। उनका जन्म 16 अक्टूबर 1944 को उत्तर प्रदेश के बनारस में हुआ था। उनके पिता वासुदेव महाराज भी संगीत से जुड़े थे। ऐसे में लच्छू महाराज को बचपन से ही संगीत का माहौल मिला।

उन्होंने अपने पिता से तबला बजाना सीखा और बहुत छोटी उम्र में ही मंच पर अपनी कला दिखाने लगे। धीरे-धीरे उनकी उंगलियों की तेजी, ताल पर पकड़ और अलग अंदाज ने लोगों का ध्यान खींचना शुरू कर दिया।

उनके कार्यक्रमों में बैठे लोग उनकी कला में खो जाते थे। लच्छू महाराज ने शास्त्रीय संगीत के साथ हिंदी फिल्मों में भी काम किया। वह 'महल', 'मुगल-ए-आजम', 'छोटी छोटी बातें' और 'पाकीजा' जैसी फिल्मों से जुड़े रहे। फिल्मों में उन्होंने कोरियोग्राफी के जरिए भी अपनी प्रतिभा दिखाई। 'मुगल-ए-आजम' और 'पाकीजा' जैसी फिल्मों में शास्त्रीय नृत्य की खूबसूरती दिखाने में उनका योगदान रहा।

उस दौर में फिल्मों के गानों में कथक और दूसरे शास्त्रीय नृत्य को जगह देना आसान काम नहीं था, लेकिन लच्छू महाराज इस कला को पर्दे पर पेश करने में माहिर थे। लच्छू महाराज के जीवन का सबसे चर्चित किस्सा पद्मश्री सम्मान से जुड़ा है। सरकार ने उन्हें इस सम्मान के लिए चुना था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि कलाकार को उसके काम के लिए मिलने वाली सच्ची सराहना दर्शकों से मिलती है। दर्शकों की तालियां और उनकी वाहवाही ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान थीं। वह नहीं चाहते थे कि किसी पुरस्कार को उनकी कला की पहचान का पैमाना बनाया जाए।

लच्छू महाराज का रिश्ता बॉलीवुड अभिनेता गोविंदा से भी था। वह गोविंदा के मामा थे। उनकी बहन निर्मला देवी, गोविंदा की मां थीं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोविंदा ने उन्हें मुंबई लाने की कोशिश भी की, लेकिन लच्छू महाराज का मन बनारस में ही लगता था। वह अपने शहर और वहां के माहौल से गहराई से जुड़े हुए थे। उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन बनारस में बिताया और अपनी पसंद के मुताबिक जिंदगी जी।

लच्छू महाराज का निधन 28 जुलाई 2016 को बनारस में हुआ। वह 71 साल के थे।

--आईएएनएस

पीके/एबीएम