मुंबई, 15 अक्टूबर (आईएएनएस)। निर्देशक: अविनाश अरुण, कलाकार: राजकुमार राव, वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी, अवधि: 140 मिनट, रेटिंग: 4.5
हम सभी को 26/11 याद है। मुंबई पर हुए आतंकी हमले की तस्वीरें, डर, बेबसी और उसमें गंवाई गई जानें आज भी हमारी सामूहिक स्मृति में दर्ज हैं। लेकिन जहां हममें से ज्यादातर लोग उस भयावह रात की त्रासदी को याद करते हैं, वहीं कितने लोग वास्तव में उसके बाद की कहानी जानते हैं? लंबी कानूनी लड़ाई, न्याय की तलाश और उन लोगों के बारे में, जिन्होंने कैमरों के वहां से हट जाने के बाद भी अपनी जिम्मेदारी निभाई?
उज्ज्वल निकम से जुड़ी ये पंक्तियां, ‘जल्दबाजी में मिला न्याय, न्याय को दफन करने जैसा है’, फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ के सार को बखूबी बयां करती हैं। फिल्म हमें उस त्रासदी से आगे ले जाती है, जिसे हम याद करते हैं और उसके बाद अदालत में लड़ी गई लड़ाई दिखाती है। यह याद दिलाती है कि जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे तक लाना एक अलग लड़ाई थी, जिसके लिए धैर्य, दृढ़ विश्वास और कानून में अटूट भरोसे की जरूरत थी।
अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी ‘प्रहार’ अजमल कसाब के मुकदमे की कानूनी कार्यवाही के साथ-साथ 1993 के मुंबई बम धमाकों के मामले को भी छूती है। हालांकि, फिल्म केवल अदालत में होने वाली बहस तक सीमित नहीं है। यह उस व्यक्ति के निजी जीवन में किए गए त्याग को भी दिखाती है, जिसके पेशे में सामान्य पारिवारिक जीवन के लिए बहुत कम जगह बचती है।
राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम की भूमिका निभाई है, जबकि ललित प्रभाकर कसाब के किरदार में हैं। सिकंदर खेर ने कसाब के बचाव पक्ष के वकील की भूमिका निभाई है और जयदीप अहलावत एक पाकिस्तानी सरकारी अभियोजक के रूप में नजर आते हैं, जो कसाब के मामले की जांच के लिए विशेष परिषद के हिस्से के रूप में भारत आता है। वामिका गब्बी ने निकम की पत्नी ज्योति और आशीष विद्यार्थी ने न्यायमूर्ति एम. एल. तहिलियानी की भूमिका निभाई है।
राजकुमार राव फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका अभिनय संयम पर आधारित है। उनके हाव-भाव से लेकर संवाद अदायगी और अदालत में उनकी मजबूत मौजूदगी तक, सब कुछ सधा हुआ है। वह हर बातचीत को नाटकीय घोषणा में नहीं बदलते और यही बात फिल्म के पक्ष में काम करती है। कसाब से जुड़े अंतिम तर्क और अदालत में होने वाले टकराव विशेष रूप से प्रभावशाली हैं। राव निकम के दृढ़ विश्वास को बिना किसी बनावटीपन के सामने लाते हैं। वह किरदार के निजी संघर्षों को भी उभारते हैं, जिससे निकम के अभियोजक और पिता के रूप के बीच का अंतर उनके अभिनय का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
फिल्म की सबसे भावनात्मक कहानियों में से एक उज्ज्वल निकम और उनके बेटे अनिकेत के रिश्ते की है। निकम अपने मामलों में इतने व्यस्त रहते हैं कि पारिवारिक जीवन अक्सर पीछे छूट जाता है। जब अनिकेत कानून की पढ़ाई पूरी कर अपने पिता के साथ इंटर्न के रूप में काम शुरू करता है, तो उसे उनसे सीखने की उम्मीद होती है। लेकिन निकम का बेटा होने के बावजूद उसे कोई विशेष सुविधा नहीं मिलती। उनके पिता उसे किसी अन्य कनिष्ठ सहयोगी की तरह ही मानते हैं और एक अभिभावक की गर्मजोशी के बजाय एक बॉस की सख्ती दिखाते हैं।
उनके रिश्ते में पेशेवर सम्मान और निजी अपनापन पाने की चाह के बीच लगातार खींचतान दिखाई देती है। अदालत में अनुशासन के पीछे एक ऐसा बेटा है, जो अपने पिता की स्वीकृति चाहता है, और एक ऐसा पिता है, जिसे अपना स्नेह जाहिर करने में कठिनाई होती है।
ललित प्रभाकर ने कसाब के किरदार में मजबूत छाप छोड़ी है और उनके अभिनय में एक बेचैन करने वाला प्रभाव है। फिल्म के अंत की ओर उनका इकबालिया बयान विशेष रूप से यादगार है और दृश्य खत्म होने के बाद भी मन में बना रहता है। सिकंदर खेर ने कसाब के बचाव पक्ष के वकील की भूमिका में गंभीरता और संयम दिखाया है, जबकि जयदीप अहलावत पाकिस्तानी सरकारी अभियोजक के रूप में प्रभावशाली नजर आते हैं। अहलावत अपने किरदार को कई परतों के साथ पेश करते हैं। वामिका गब्बी ज्योति निकम के रूप में भावनात्मक गर्माहट लाती हैं और उस परिवार की याद दिलाती हैं, जो उज्ज्वल निकम की व्यस्त पेशेवर जिंदगी के परिणामों के साथ जीता है। आशीष विद्यार्थी भी न्यायमूर्ति एम. एल. तहिलियानी के रूप में अदालती कार्यवाही को गंभीरता प्रदान करते हैं।
अरुण का निर्देशन संतुलित और भरोसेमंद है। वह लगातार भावनाओं को बढ़ाने की कोशिश करने के बजाय कानूनी कार्यवाही को अपना तनाव पैदा करने का मौका देते हैं। फिल्म की लेखनी प्रभावशाली है और कई संवाद बिना केवल प्रभावित करने के लिए दिए गए भाषण लगे अपना वजन रखते हैं। अदालत के दृश्य दलीलों, सबूतों और न्याय की तलाश पर केंद्रित रहते हैं। इससे गंभीरता खोए बिना कहानी दिलचस्प बनी रहती है। बैकग्राउंड स्कोर महत्वपूर्ण बहसों में तनाव बढ़ाता है और भावनात्मक दृश्यों को जरूरी प्रभाव देता है, लेकिन कलाकारों के अभिनय पर हावी नहीं होता।
दिनेश विजान के निर्माण में मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनी ‘प्रहार’ इस प्रोडक्शन हाउस की अलग-अलग शैलियों की फिल्मों की कड़ी में एक और पेशकश है। ‘बदलापुर’ के गंभीर और अंधेरे पक्ष से लेकर सामाजिक विषयों पर आधारित ‘मिमी’ और ‘स्त्री’ की हॉरर-कॉमेडी दुनिया तक, विजान की फिल्मों में अलग-अलग तरह की कहानियों को समर्थन देने की कोशिश दिखाई देती है। यह फिल्म एक वास्तविक कानूनी लड़ाई और राष्ट्रीय त्रासदी के बाद जवाबदेही सुनिश्चित करने की कठिन प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करती है। अरुण के निर्देशन में कहानी को संवेदनशीलता और संयम के साथ पेश किया गया है।
‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ एक दिलचस्प कोर्टरूम ड्रामा है, जो सुर्खियों से आगे बढ़कर कहानी दिखाती है। राजकुमार राव अपने प्रतिबद्ध अभिनय से फिल्म को मजबूती देते हैं, जबकि सहायक कलाकार कानूनी लड़ाई और उसके निजी परिणामों को गहराई प्रदान करते हैं। लेखन, निर्देशन और बैकग्राउंड स्कोर तनाव और भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म याद दिलाती है कि न्याय रातोंरात नहीं मिलता और इसे हासिल करने के लिए ऐसे त्याग करने पड़ते हैं, जो अक्सर बाहरी दुनिया की नजरों से दूर रह जाते हैं।
‘प्रहार’ अपने अभिनय, भावनात्मक गहराई और न्याय की लंबी राह को दिखाने के लिए देखने लायक कोर्टरूम ड्रामा है।
--आईएएनएस
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