ढाका, 8 फरवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव हो रहे हैं। चुनावी तैयारियों और अभियानों के बीच बांग्लादेश में महिलाओं की आत्मनिर्भरता, रोटी और रोजगार एक अहम मुद्दा बना हुआ है। खासतौर से जमात-ए-इस्लामी की तरफ से महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी के बाद से देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी ने तूल पकड़ लिया।
दरअसल, बांग्लादेश में जो चुनाव होने वाला है, उसमें महिला उम्मीदवारों का आंकड़ा सिर्फ चार फीसदी के आसपास है। यहां आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन बैलेट पेपर पर उनका नाम मुश्किल से ही आता है।
स्थानीय मीडिया ने बताया कि कई चुनाव क्षेत्रों की महिला उम्मीदवारों ने ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर साइबरबुलिंग, चरित्र हनन, यौन उत्पीड़न और धमकियों की रिपोर्ट की है। इन कृत्यों का मकसद महिला उम्मीदवारों को डराना और उनके चुनावी कैंपेन को रोकना है।
ढाका-19 से नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) उम्मीदवार दिलशाना पारुल ने कहा कि उन्हें लगातार ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा है, खासकर हेडस्कार्फ पहनने के उनके फैसले को लेकर।
बांग्लादेशी अखबार 'द ढाका ट्रिब्यून' ने उनके हवाले से कहा, "न सिर्फ विरोधी पार्टियों के समर्थकों बल्कि जो लोग खुद को प्रोग्रेसिव कहते हैं, वे भी इसमें शामिल हैं। मेरा मानना है कि मुझे सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया है।"
पारुल ने आरोप लगाया है कि उनके अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकियां भी मिली हैं।
उन्होंने कहा, "हाल ही में, मेरी टीम पर एक गांव की बिजली साइट पर हमला हुआ। मुझे यह भी चेतावनी देने वाले कॉल आए कि अशुलिया में एक पूर्व वार्ड कमिश्नर मेरी महिला श्रमिकों को वोट देने से रोकने के लिए धमका रहा है। जब भी ऐसा लगता है कि बीएनपी हार सकती है, तो धमकियां बढ़ जाती हैं।"
लिंग आधारित टारगेटिंग पर जोर देते हुए, पारुल ने कहा कि पुरुष नेताओं की ज्यादातर आलोचना भ्रष्टाचार या नीतियों को लेकर होती है, जबकि महिलाओं पर उनके चरित्र को लेकर हमला किया जाता है। इसके बावजूद, मैं फील्ड में काम करती रहूंगी और अपने चुनाव क्षेत्र के विकास पर ध्यान दूंगी।
'द ढाका ट्रिब्यून' के अनुसार, ढाका-20 से एनसीपी उम्मीदवार नबीला तस्नीद ने कहा, "हमारे बैनर और फेस्टून फाड़ दिए गए हैं। जब हमने अधिकारियों को इसकी सूचना दी, तो उन्होंने फोटो या वीडियो सबूत मांगे, जिससे पता चलता है कि इंस्टीट्यूशनल समर्थन कहां है।"
तस्नीद ने गठबंधन समर्थित समूहों पर गलत जानकारी फैलाने और महिला नेतृत्व पर सवाल उठाने का आरोप लगाया। वे दावा करते हैं कि समाज महिला नेताओं को स्वीकार नहीं करेगा। ऑनलाइन प्रोपेगेंडा और चरित्र पर हमला उनका मुख्य हथियार है।
तस्नीद ने कहा कि उनका कैंपेन एजेंडा खेती, किसानों के अधिकार, रोजगार, तकनीकी शिक्षा और महिलाओं के लिए विदेशों में अवसरों पर फोकस करता है। ढाका-12 से गोनोशोंगहोटी आंदोलन की उम्मीदवार तस्लीमा अख्तर ने कहा कि ऑनलाइन उत्पीड़न इसलिए बढ़ता है क्योंकि बिना नाम बताए हमला करना आसान होता है।
उन्होंने कहा, "जब टारगेट कोई महिला होती है, तो यह और भी आसान हो जाता है। डराने-धमकाने से वह महिलाओं के अधिकारों, बारहवीं क्लास तक मुफ्त शिक्षा और भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और ड्रग सिंडिकेट के खिलाफ कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगी।"
आयोग की तरफ से जारी आंकड़े के अनुसार चुनाव लड़ रही 51 दलों में से 30 पार्टियों ने एक भी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि बढ़ती कानून-व्यवस्था महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोकने वाली एक मुख्य वजह है।
--आईएएनएस
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