गोल्डी आनंद: स्टाइलिश पिक्चराइजेशन से दर्शकों के दिलों पर छोड़ी छाप, हर सीन और गाने में डाली जान

गोल्डी आनंद: स्टाइलिश पिक्चराइजेशन से दर्शकों के दिलों पर छोड़ी छाप, फिल्मों में हर सीन और हर गाने में डाली जान

मुंबई, 21 जनवरी (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल अपनी फिल्मों से ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी शैली से भी हमेशा याद रहते हैं। विजय आनंद, जिन्हें गोल्डी आनंद के नाम से भी जाना जाता था, ऐसे ही फिल्मकार थे। उन्होंने न केवल अपने निर्देशन और कहानी कहने के अंदाज से सिनेमा को नया रंग दिया, बल्कि वे अपने गानों में स्टाइलिश पिक्चराइजेशन के लिए भी हमेशा जाने जाते रहे।

उनके गाने जैसे 'ओ हसीना जुल्फों वाली', 'आज फिर जीने की तमन्ना है', और 'होंठों में ऐसी बात' आज भी दर्शकों के दिलों में बसते हैं। उनका यह अंदाज उनकी फिल्मों के हर सीन में चमकता था और दर्शकों को एक अलग अनुभव देता था।

विजय आनंद का जन्म 22 जनवरी 1934 को पंजाब के गुरदासपुर में हुआ था। उनके परिवार में पहले से ही फिल्मी माहौल था। उनके बड़े भाई चेतन आनंद एक प्रसिद्ध निर्देशक और प्रोड्यूसर थे, जबकि देव आनंद एक सुपरस्टार अभिनेता और निर्देशक के रूप में जाने जाते थे। ऐसे परिवार में पले-बढ़े विजय ने भी बचपन से ही कला और सिनेमा की ओर रुचि दिखाई। उनके पिता पिशोरी लाल आनंद एक सफल वकील थे। उनकी माता का बचपन में ही निधन हो गया था, इसलिए वे बड़े भाई और भाभी की छत्र-छाया में बड़े हुए।

विजय आनंद ने अपनी पढ़ाई मुंबई से की। कॉलेज के दिनों में उन्होंने अपनी भाभी उमा आनंद के साथ मिलकर एक स्क्रिप्ट लिखी, जो आगे चलकर फिल्म 'टैक्सी ड्राइवर' बनी। यह फिल्म 1954 में रिलीज हुई और इसे उनके बड़े भाई चेतन आनंद ने डायरेक्ट किया। इस फिल्म में देव आनंद मुख्य अभिनेता थे। इस अनुभव ने विजय आनंद को फिल्म इंडस्ट्री की बारीकियां समझने का मौका दिया।

विजय आनंद ने 23 साल की उम्र में अपनी पहली फिल्म 'नौ दो ग्यारह' डायरेक्ट की। उस समय कम उम्र में इतनी परिपक्वता देख सभी हैरान रह गए थे। उन्होंने केवल 40 दिनों में इस फिल्म की शूटिंग पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने 'काला बाजार', 'तेरे घर के सामने', और 'गाइड' जैसी फिल्में बनाईं। खासकर 'गाइड', जो आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित थी, ने उन्हें और देव आनंद को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

उनकी फिल्मों की सबसे खास बात उनका गानों को दिखाने का अंदाज था। विजय आनंद हर गाने को एक कहानी की तरह पेश करते थे। चाहे वह रोमांटिक गाना हो या थ्रिलर सीन, उनका स्टाइलिश पिक्चराइजेशन हर बार दर्शकों को आकर्षित करता। 'ओ हसीना जुल्फों वाली' में उनकी आधुनिकता और डांस की समझ साफ दिखाई देती है, जबकि 'आज फिर जीने की तमन्ना है' में भावनाओं और संगीत को पूरी तरह महसूस कराया गया। इसी तरह 'होंठों में ऐसी बात' में रोमांस और रहस्य का अद्भुत मिश्रण था, जो आज भी फिल्म प्रेमियों को याद है।

विजय आनंद ने केवल निर्देशक ही नहीं बल्कि अभिनेता, लेखक और संपादक के रूप में भी काम किया। उन्होंने 'आगरा रोड', 'कोरा कागज', 'हकीकत' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' जैसी फिल्मों में अभिनय किया। 1990 के दशक में दूरदर्शन पर 'तहकीकात' नामक सीरियल में डिटेक्टिव सैम की भूमिका निभाकर उन्होंने टीवी दर्शकों के लिए भी अपने अभिनय का जादू दिखाया।

विजय आनंद को उनकी फिल्मों के लिए कई पुरस्कार मिले। 'गाइड' के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, वहीं 'जॉनी मेरा नाम' और 'डबल क्रॉस' जैसी फिल्मों के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संपादन और पटकथा के पुरस्कार भी मिले।

कामयाबी के बीच विजय आनंद ने अपने जीवन में कठिन दौर भी देखे। कई फिल्मों की असफलता और व्यक्तिगत परेशानियों के चलते वे डिप्रेशन का शिकार हो गए और कुछ समय के लिए ओशो के शरण में चले गए। आध्यात्मिक समय ने उन्हें मानसिक शांति दी, लेकिन 23 फरवरी 2004 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

--आईएएनएस

पीके/एबीएम