धनबाद में 'मेघ पाइन अभियान' का दो साल में दिखा असर, जल संकट का मिला टिकाऊ समाधान

धनबाद में 'मेघ पाइन अभियान' ने 2 साल में दिखाया असर, जल संकट का टिकाऊ समाधान

पटना, 4 अगस्त (आईएएनएस)। सुरक्षित पेयजल, भूजल संरक्षण और भविष्य के जल संकट से निपटने के लिए 'मेघ पाइन अभियान' पिछले दो दशकों से उत्तर बिहार और झारखंड के धनबाद में वर्षा जल संचयन और पारंपरिक कुओं के पुनर्जीवन पर काम कर रहा है। अभियान के प्रतिनिधि एकलव्य प्रसाद का कहना है कि यदि हर व्यक्ति अपने हिस्से की बारिश के पानी को जमीन में वापस पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाए तो भूजल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

एकलव्य प्रसाद ने बताया कि 'मेघ पाइन अभियान' की शुरुआत वर्ष 2005 में उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में जल संरक्षण को केंद्र में रखकर की गई थी। इसके बाद वर्ष 2014 से अभियान ने झारखंड के धनबाद जिले में भी कार्य शुरू किया। संगठन की कार्यशैली हमेशा किसी भी मुद्दे पर काम शुरू करने से पहले उसके वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय परिस्थितियों को समझने पर आधारित रही है।

उन्होंने बताया कि धनबाद में काम शुरू करने से पहले बलियापुर, टुंडी और पूर्वी टुंडी प्रखंडों के लगभग 5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में भूजल की स्थिति का विस्तृत अध्ययन किया गया। यह अध्ययन ग्रामीण विकास मंत्रालय और यूएनडीपी के सहयोग से हुआ। अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि स्थानीय लोगों के पारंपरिक ज्ञान को वाटरशेड योजनाओं के साथ जोड़कर सहभागिता आधारित भूजल प्रबंधन का प्रभावी मॉडल तैयार किया जा सकता है।

एकलव्य प्रसाद ने बताया कि वर्ष 2015 में 'बालेश्वर प्रसाद ओरेशन सीरीज' के तहत देश के प्रसिद्ध जल विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु कुलकर्णी को धनबाद आमंत्रित किया गया। इस संवाद के बाद धनबाद कार्मेल स्कूल के 20 विद्यार्थियों के साथ 'गैंग्स ऑफ 20' नामक पहल शुरू की गई। इन विद्यार्थियों को कक्षा 8 से 12 तक लगातार मेंटर किया गया ताकि भविष्य में जल संरक्षण के प्रति जागरूक नेतृत्व तैयार हो सके। इसी पहल के तहत 'पार्टिसिपेटरी एक्शन रिसर्च ऑन अर्बन ग्राउंडवाटर' फ्रेमवर्क विकसित किया गया। विद्यार्थियों ने सर्वे किया, जिसमें सामने आया कि धनबाद के 60 से 70 प्रतिशत परिवार भूजल पर निर्भर हैं, जबकि वर्षा जल का उपयोग लगभग न के बराबर है। इसके बाद विद्यार्थियों को अपने-अपने घरों में पानी की खपत का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया गया। इस अध्ययन से यह समझ विकसित हुई कि यदि अधिकांश आबादी भूजल पर निर्भर है तो उसे रिचार्ज करना भी उतना ही जरूरी है।

एकलव्य प्रसाद ने बताया कि अध्ययन के बाद धनबाद स्थित 'उत्तरायण' परिसर में 5 जून 2018 से एक मॉडल रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित किया गया। यहां केवल वर्षा जल संग्रहण ही नहीं किया जाता, बल्कि प्रतिदिन वर्षा की मात्रा, कुएं के जलस्तर और भूजल रिचार्ज की नियमित मॉनिटरिंग भी की जाती है। 31 जुलाई 2026 तक इस प्रणाली के माध्यम से लगभग 59 लाख 91 हजार लीटर वर्षा जल भूजल के शैलो एक्विफर में पहुंचाया जा चुका है, जो सामान्य स्थिति में बहकर नष्ट हो जाता। इस परियोजना ने यह साबित किया है कि यदि वैज्ञानिक तरीके से वर्षा जल संचयन किया जाए तो भूजल को लगातार रिचार्ज किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि इस मॉडल से प्रेरित होकर आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अमृत मिशन के तहत वर्ष 2022-24 में 'शैलो एक्विफर मैनेजमेंट पायलट' शुरू किया गया। इस परियोजना के लिए देश के 10 शहरों का चयन किया गया, जिनमें धनबाद भी शामिल था। इस परियोजना के तहत धनबाद नगर निगम के 55 वार्डों में भूजल और जल स्रोतों का अध्ययन किया गया। परियोजना का निर्माण कार्य नगर निगम ने किया, जबकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के माध्यम से मेघ पाइन अभियान को तकनीकी सहयोग की जिम्मेदारी मिली।

एकलव्य प्रसाद ने बताया कि परियोजना शुरू होने से पहले धनबाद नगर निगम से सरकारी कुओं, तालाबों और चापाकलों की गणना कराने का आग्रह किया गया। नगर निगम ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी और इसके बाद 108 स्थानों का सर्वेक्षण किया गया। सर्वे के दौरान झरिया, कतरास, छाताटांड़ और सिंदरी जैसे इलाकों में यह सामने आया कि आज भी बड़ी संख्या में लोग कुओं पर निर्भर हैं। गर्मियों में जलस्तर गिरने पर इन क्षेत्रों में गंभीर जल संकट पैदा हो जाता है क्योंकि कई स्थानों तक पाइपलाइन से जलापूर्ति पहुंचाना भौगोलिक कारणों से कठिन है।

उन्होंने बताया कि विस्तृत अध्ययन के बाद पांच अलग-अलग स्थानों का चयन किया गया, जहां अलग-अलग प्रकार के मॉडल विकसित किए गए। जीवन ज्योति स्कूल में रेनवाटर हार्वेस्टिंग के जरिए स्कूल के कुएं को रिचार्ज किया गया, जहां गर्मियों में जलस्तर लगभग 28 फीट तक नीचे चला जाता था। बेरा कॉलोनी में तालाब और कुएं के संरक्षण पर काम किया गया, जहां पहले फरवरी-मार्च में ही जल स्रोत सूख जाते थे। भगतडीह में लगभग 100 वर्ष पुराने विरासत कुएं का जीर्णोद्धार किया गया, जिससे आज भी हजारों लोगों को पानी मिलता है। नीचे मोहल्ला में महिलाओं द्वारा वर्षों पहले खोदे गए कच्चे कुएं को पक्का बनाया गया, जिससे लोगों को सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल मिलने लगा। इसके अलावा बलियापुर सीमा से लगे क्षेत्र में भी कुएं के संरक्षण और भूजल रिचार्ज का कार्य किया गया।

उन्होंने कहा कि इस पूरी परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें स्थानीय समुदाय और उनके पारंपरिक ज्ञान को केंद्र में रखा गया। कई निर्णय स्थानीय लोगों के अनुभव के आधार पर लिए गए, जिससे परियोजना अधिक प्रभावी साबित हुई।

एकलव्य प्रसाद ने बताया कि जून 2024 में परियोजना पूरी होने के बाद भी निगरानी बंद नहीं की गई। पिछले दो वर्षों से हर महीने चयनित पांचों स्थलों पर कुओं के जलस्तर की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। इस वर्ष धनबाद में जून महीने में केवल 64 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से काफी कम थी। इसके बावजूद लोगों ने महसूस किया कि थोड़ी सी बारिश के बाद भी कुओं का जलस्तर पहले की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। इससे संकेत मिलता है कि रेनवाटर हार्वेस्टिंग के जरिए पानी प्रभावी रूप से शैलो एक्विफर तक पहुंच रहा है।

धनबाद में काम करने के अनुभव साझा करते हुए एकलव्य प्रसाद ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। लोग यदि केवल होल्डिंग टैक्स में मिलने वाली छूट के लिए रेनवाटर हार्वेस्टिंग करेंगे तो उसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यह काम क्यों किया जा रहा है। आज अधिकांश लोग बोरिंग से पानी निकालते हैं और जब जलस्तर नीचे चला जाता है तो बोरिंग को और गहरा करा लेते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि निकाले गए पानी की भरपाई कैसे होगी। जिस प्रकार बैंक खाते से पैसा निकालने के बाद उसे वापस जमा करना पड़ता है, उसी तरह भूजल का उपयोग करने वालों की भी जिम्मेदारी है कि वे वर्षा जल को जमीन में पहुंचाकर उसे रिचार्ज करें।

उन्होंने कहा कि भूजल एक अदृश्य संसाधन है और अब समय आ गया है कि इसे लोगों के लिए "दृश्य संसाधन" बनाया जाए। पहले लोग कुओं के माध्यम से भूजल को देखते थे, लेकिन अब अधिकांश कुएं या तो बंद हो गए हैं या कूड़ाघर में बदल गए हैं। ऐसे में समाज का भूजल से सीधा जुड़ाव भी समाप्त हो गया है। केवल रेनवाटर हार्वेस्टिंग का ढांचा बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके परिणामों की वैज्ञानिक मॉनिटरिंग भी जरूरी है। जब लोगों के सामने यह प्रमाण होगा कि किसी प्रणाली ने लाखों लीटर पानी भूजल में पहुंचाया है, तभी समाज इस दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ेगा। यदि हर घर, स्कूल, कार्यालय, संस्था और आवासीय परिसर अपनी छत का वर्षा जल जमीन में पहुंचाने का संकल्प लें, तो आने वाले वर्षों में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

--आईएएनएस

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