नई दिल्ली, 25 जनवरी (आईएएनएस)। 26 जनवरी, सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि हमारे देश की आजादी और लोकतंत्र की एक मिसाल है। इस दिन हमें अपना संविधान मिला था, जिस वजह से हम हर साल इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन 2015 में इसी दिन भारत ने एक ऐसे महान कलाकार को भी खो दिया, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से आम आदमी की आवाज को दुनिया तक पहुंचाया और कभी सत्ता से सवाल पूछने से भी नहीं कतराए।
हम बात कर रहे हैं आरके लक्ष्मण की, जिन्हें 'कॉमन मैन' का 'हीरो' भी कहा जाता है। आरके लक्ष्मण ने अपनी रचनाओं से सिर्फ हंसाया ही नहीं, बल्कि सोचने पर भी मजबूर किया। उनके कार्टून में सत्ता की गलती, आम आदमी की तकलीफ और समाज के छोटे-बड़े सवाल हमेशा सहज और व्यंग्यात्मक अंदाज में सामने आते थे। उनका सबसे चर्चित किरदार ‘द कॉमन मैन’ था, एक साधारण सा आदमी, जो चुपचाप राजनीति और सामाजिक हालात को देखता रहता है, मगर उसकी आंखों में हर बार सवाल और निराशा झलकती है।
आरके लक्ष्मण का जन्म 24 अक्टूबर 1921 को मैसूर में हुआ। बचपन से ही कला और हास्य में उनकी रुचि थी। उन्होंने अपनी पढ़ाई और कला की शिक्षा पूरी करने के बाद मुंबई में पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत उन्होंने स्थानीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं से की, और धीरे-धीरे अपनी प्रतिभा से उन्होंने द फ्री प्रेस जर्नल और बाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया में जगह बनाई। यही वह मंच बना, जिसने उन्हें देश और दुनिया में पहचान दिलाई।
उनकी कार्टूनिंग शैली बेहद सरल थी, लेकिन संदेश गहरा और असरदार था। हंसी-मजाक के बीच वे कभी सत्ता और नेताओं को चुनौती देते, तो कभी आम आदमी के दर्द को उजागर करते।
आरके लक्ष्मण के काम को देखते हुए उन्हें 1973 में पद्म भूषण और 2005 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी कला को सराहा गया और उन्हें 1984 में रेमन मैग्सेस पुरस्कार भी मिला, जिसे एशिया का नोबेल कहा जाता है।
उनकी रचनाएं और कार्टून सिर्फ अखबारों में छपे चित्र नहीं थे, बल्कि आम आदमी की दास्तान थे। उन्होंने कॉमन मैन के माध्यम से यह दिखाया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज कितनी अहम होती है। उनके चित्रों में सादगी, ह्यूमर और व्यंग्य का ऐसा मिश्रण था कि कोई भी पाठक बिना रुके उन्हें देखता और सोचता रहता।
आरके लक्ष्मण का निधन 26 जनवरी 2015 को हुआ। 94 साल की उम्र में उन्होंने हमें अलविदा कहा, लेकिन कॉमन मैन आज भी हमारे बीच जीवित है। पुणे में उनकी याद में एक आर्ट गैलरी बनी है, जहां उनके द्वारा बनाए गए कार्टून संग्रहित हैं। यह गैलरी आज भी उनकी कला और संदेश को जन-जन तक पहुंचाती है।
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