मुंबई, 3 अप्रैल (आईएएनएस)। 1947 के बंटवारे ने हरिकिशन (मनोज) से उनका घर तो छीन लिया, लेकिन उनके दिल में 'मातृभूमि' के लिए एक ऐसा गहरा प्रेम बो दिया, जो आगे चलकर उनके सिनेमा की आत्मा बना। 1955 में जब वे दिल्ली से आंखों में हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई (तब बॉम्बे) पहुंचे, तो राह आसान नहीं थी।
24 जुलाई 1937 को जन्मे मनोज कुमार की करियर की शुरुआत हुई 1956 की फिल्म 'गंगू तेली' में एक छोटे से रोल से। इसके बाद, 1957 में 'फैशन' नाम की फिल्म में उन्होंने एक भिखारी का किरदार निभाया। एक भिखारी के रोल से शुरुआत करने वाला यह युवा जल्द ही 'हरियाली और रास्ता' (1962) जैसी फिल्म से स्टार बन गया। फिर आई 1964 की सस्पेंस-थ्रिलर 'वो कौन थी?', जिसने मनोज कुमार को फिल्म इंडस्ट्री का एक स्थापित सितारा बना दिया। लेकिन, मनोज कुमार के भीतर का फिल्मकार अभी कुछ और ही तलाश रहा था।
1965 का साल भारतीय सिनेमा और मनोज कुमार, दोनों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया। उन्होंने शहीद भगत सिंह के जीवन पर आधारित फिल्म 'शहीद' बनाई। यह फिल्म इतनी असरदार थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसे देखा और मनोज कुमार से एक खास गुजारिश की। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने कहा, "क्यों न तुम मेरे नारे 'जय जवान, जय किसान' पर एक फिल्म बनाओ?"
इसी एक वाक्य ने 1967 की कालजयी फिल्म 'उपकार' को जन्म दिया। मनोज कुमार ने इस फिल्म का निर्देशन किया और इसमें 'भारत' नाम के एक ऐसे युवक का किरदार निभाया जो किसान भी था और सैनिक भी। "मेरे देश की धरती सोना उगले..." जब पर्दे पर गूंजा, तो सिनेमाघरों में बैठे दर्शकों की आंखें नम हो गईं। यह केवल एक फिल्म नहीं थी। मनोज कुमार के ही शब्दों में, यह 16,000 फीट लंबा सेल्युलाइड का भारतीय झंडा था। इसी फिल्म ने हमेशा-हमेशा के लिए उन्हें 'भारत कुमार' की उपाधि दे दी।
मनोज कुमार सिर्फ कैमरे के सामने का चेहरा नहीं थे। वे भारतीय सिनेमा के उन दुर्लभ कलाकारों में से थे, जो कहानी लिखते थे, संपादन करते थे और निर्देशन की कमान भी खुद संभालते थे।
उनका सिनेमाई अंदाज बिल्कुल अलग था। उनकी पारखी नजर का ही कमाल था कि उन्होंने 60 के दशक के सबसे खूंखार विलेन 'प्राण' को 'उपकार' में 'मलंग चाचा' का सकारात्मक रोल देकर सबका दिल जीत लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974) में संघर्षरत अमिताभ बच्चन को भी एक बड़ा मौका दिया।
1981 में मनोज कुमार ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर, भारी कर्ज लेकर ऐतिहासिक महाकाव्य 'क्रांति' बनाई। उन्होंने अपने आदर्श दिलीप कुमार को संन्यास से वापस लाकर इस फिल्म में कास्ट किया। यह फिल्म 1981 की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई, जिसने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
दिग्गज बॉलीवुड अभिनेता, निर्माता और निर्देशक मनोज कुमार को वर्ष 2015 के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार उन्हें 3 मई 2016 को 63वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में प्रदान किया गया।
जीवन के अंतिम वर्षों में 'भारत कुमार' कई गंभीर बीमारियों, विशेषकर लीवर सिरोसिस से जूझते रहे। 4 अप्रैल 2025 को मुंबई के एक अस्पताल में उनकी सांसें थम गईं।
--आईएएनएस
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