अलेक्जेंडर कनिंघम: कैसे एक सैन्य इंजीनियर ने की एएसआई की स्थापना

अलेक्जेंडर कनिंघम: कैसे एक सैन्य इंजीनियर ने की एएसआई की स्थापना

नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। 23 जनवरी 1814 को लंदन में जन्मे अलेक्जेंडर कनिंघम को विरासत में कविता मिली थी (उनके पिता एलन कनिंघम एक कवि थे), लेकिन उनकी किस्मत में भारत की मिट्टी की परतें खोलना लिखा था। 1833 में जब 19 साल का यह नौजवान 'बंगाल इंजीनियर्स' का सेकंड लेफ्टिनेंट बनकर कलकत्ता पहुंचा तो उसे अंदाजा नहीं था कि वह एक ऐसी यात्रा पर है जो उसे मेजर जनरल के पद तक और फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना तक ले जाएगी।

कनिंघम का सैन्य करियर किसी थ्रिलर फिल्म जैसा था। उन्होंने युद्धों में नावों के पुल बनाए, लद्दाख की दुर्गम सीमाओं का निर्धारण किया और ग्वालियर में इंजीनियरिंग के चमत्कार दिखाए, लेकिन उनके भीतर एक और प्यास थी। वह यह थी कि प्राचीन सिक्कों और शिलालेखों को समझने की प्यास।

कलकत्ता पहुंचते ही कनिंघम की मुलाकात महान विद्वान जेम्स प्रिंसेप से हुई। प्रिंसेप वही व्यक्ति थे, जिन्होंने पहली बार ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों को पढ़ा था। कनिंघम और प्रिंसेप की जुगलबंदी ने भारतीय इतिहास को पौराणिक कथाओं के धुंधलके से निकालकर ठोस साक्ष्यों की जमीन पर खड़ा कर दिया। कनिंघम ने महसूस किया कि भारत का असली इतिहास कागजों में नहीं, बल्कि मिट्टी के नीचे दबे उन खंभों और सिक्कों में है, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते थे।

कनिंघम की कार्यशैली सबसे अनोखी थी। उनके पास ह्वेनसांग और फाहियान जैसे प्राचीन चीनी यात्रियों के यात्रा वृत्तांतों का संकलन था। वे इन किताबों को किसी 'गाइडबुक' की तरह इस्तेमाल करते थे। ह्वेनसांग ने लिखा था, "इस दिशा में इतने मील जाने पर एक विहार मिलेगा," और कनिंघम वहीं पहुंच जाते थे। इसी जादुई तकनीक की मदद से उन्होंने नालंदा के उस महान विश्वविद्यालय के अवशेषों को दुनिया के सामने रखा, जो कभी ज्ञान का केंद्र था। श्रावस्ती, कौशाम्बी और वैशाली जैसे प्राचीन महानगरों को नक्शे पर वापस लाए।

कनिंघम का सबसे बड़ा योगदान बौद्ध विरासत को पुनर्जीवित करना था। सारनाथ के धमेख स्तूप को जब लोग किसी राजा का किला मान रहे थे, तब कनिंघम ने वहां खुदाई की और वह शिलालेख खोजा जिससे सिद्ध हुआ कि बुद्ध ने यहीं अपना पहला उपदेश दिया था।

सांची में उन्होंने बुद्ध के शिष्यों, सारिपुत्र और महामोग्गलन के अवशेषों को खोजा। भरहुत के पत्थरों पर उकेरी गई जातक कथाओं के लेबल पढ़कर उन्होंने बताया कि कैसे मौर्य काल की कला विकसित हुई थी। यहां तक कि आज हम जिस बोधगया के महाबोधि मंदिर के सामने शीश नवाते हैं, उसका वर्तमान स्वरूप कनिंघम के अथक जीर्णोद्धार प्रयासों की ही देन है।

क्या आप जानते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता की पहली झलक भी कनिंघम को ही मिली थी? 1853 में उन्हें हड़प्पा से एक रहस्यमयी मुहर (सील) मिली। हालांकि, उस समय वे बौद्ध इतिहास में इतने रमे थे कि उन्हें लगा यह कोई विदेशी मुहर है। वे हड़प्पा की विशालता और प्राचीनता का सटीक अंदाजा तो नहीं लगा सके, लेकिन उन्होंने ही पहली बार दुनिया को चेताया था कि रेलवे के ठेकेदार हड़प्पा की प्राचीन ईंटों को ट्रैक बिछाने के लिए लूट रहे हैं। उनके इसी अलार्म ने भविष्य में 'सिंधु सभ्यता' की खोज का मार्ग प्रशस्त किया।

1861 में जब लॉर्ड कैनिंग ने उनके प्रस्ताव पर एएसआई की स्थापना की तो कनिंघम इसके पहले सर्वेक्षक बने और बाद में महानिदेशक। उन्होंने 23 खंडों की ऐसी रिपोर्ट तैयार की, जो आज भी भारतीय पुरातत्व की 'बाइबल' मानी जाती है।

1885 में वे रिटायर हो गए। 28 नवंबर 1893 को सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

--आईएएनएस

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