'चोर बाबाओं' को खड़ा कर रही केंद्र सरकार : राजेंद्
'चोर बाबाओं' को खड़ा कर रही केंद्र सरकार : राजेंद्

संदीप पौराणिक

 भोपाल, 15 अप्रैल (आईएएनएस)| स्टॉकहोम वाटर प्राइज से सम्मानित और दुनिया में 'जलपुरुष' के तौर पर पहचाने जाने वाले पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार पानी के कारोबारियों को लाभ पहुंचाने व देश को बेपानी करने पर तुली है, वहीं नदियों को बचाने के आंदोलन को कमजोर करने के लिए 'चोर बाबाओं' को खड़ा करने में लगी है।

राजेंद्र सिंह ने राजस्थान के भीकमपुरा में आईएएनएस से खास चर्चा करते हुए देश में बढ़ते जलसंकट के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, "देश में सरकार के सहयोग से कंपनियां पानी का कारोबार कर रही हैं, लोगों को पीने का पानी भी खरीदना पड़ रहा है, क्योंकि जलस्रोतों- नदियों, तालाब आदि का पानी प्रदूषित हो रहा है। जब लोगों में जनजागृति लाने के लिए नदी बचाओ यात्राएं निकाली गईं तो सरकार ने इस अभियान को असफल करने के लिए 'चोर बाबाओं' को मंच दे दिया।"

सिंह आगे कहते हैं, "इन बाबाओं ने जगह-जगह सरकार की मदद से बड़े-बड़े कार्यक्रम किए, सरकार ने अखबार में विज्ञापन देकर और सड़कों पर होर्डिग लगाकर इन बाबाओं को पानी के सबसे बड़े रक्षक के रूप में प्रचारित किया। जबकि हकीकत यह है कि इन बाबाओं ने अब तक किसी नदी में नहाया तक नहीं होगा। वे तो एयर कंडीशनर कमरों में रहते हैं, हवाई जहाज से चलते हैं और उनके बाथरूम तो लोगों के ड्राइंग रूम से भी ज्यादा चमकदार होंगे। बस उनकी एक ही खूबी है कि वे अंग्रेजी अच्छी बोल लेते हैं।"

जलपुरुष अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, "कभी मिस्डकॉल से नदी पुनर्जीवित हो सकती है? मैंने तो अब तक न सुना और न देखा है, मगर एक बाबा तो मिस्डकॉल से नदी को पुनर्जीवित कर रहा है। बाबाओं और सरकार की सांठगांठ से उन लोगों की विश्वसनीयता पर संकट खड़ा हो गया है, जो जमीन पर काम कर रहे हैं।"

उन्होंने कहा, "जनता सवाल करती है कि फलां बाबा आए थे, वे बहुत कुछ कह गए, मगर हुआ कुछ नहीं। यह सब पानी की अविरलता, स्वच्छता, अतिक्रमण मुक्त करने वालों के खिलाफ संवेदनहीन सरकार की साजिश है, जिसमें बाबा भी शामिल हो गए हैं।"

आने वाले दिनों में जलस्रोतों के और प्रदूषित होने व जलसंकट के विकराल रूप लेने की आशंका जताते हुए सिंह ने कहा, "बारिश के पानी को रोकने के प्रयास हों, साथ ही प्रदूषित पानी उनमें न मिले, जिससे धरती के पेट में पानी पहुंचे। ऐसा होने पर विषम हालात में यही पानी लोगों के काम आए, मगर सरकार तो गंदे नालों को जलस्रोतों में मिलने दे रही है, कंपनियां पानी का दोहन कर रही हैं, उसके बाद जलशोधन संयंत्रों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। यह सब पानी के कारोबारियों को लाभ पहुंचाने के लिए हो रहा है।"

यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार इन स्थितियों को नहीं समझती? उन्होंने कहा, "सरकार उनसे कहीं ज्यादा समझदार है, बल्कि सरकार की सोच तो यह है कि जब पानी का बाजार खड़ा होगा, तभी तो कारोबारियों को लाभ होगा। पानी के कारोबारियों को लाभ पहुंचाने की जिद किस लिए है, यह किसे से छिपा नहीं है। सरकार और कारोबारी की सांठगांठ लगातार मजबूत होती जा रही है, जनता को पीने का पानी भी खरीद कर पीना पड़ रहा है। सरकार जनता की इसलिए नहीं सोचती, क्योंकि अगर जनता को लाभ मिलने लगे, तो कारोबारियों का भला नहीं होगा।"

इस संकट से आखिर निपटा कैसे जाए? यह पूछने पर राजेंद्र सिंह ने कहा, "समाज में जनजागृति जरूरी है। जल संरचनाओं को अतिक्रमण मुक्त, प्रदूषण मुक्त करना होगा। बारिश का पानी ज्यादा से ज्यादा इन संरचनाओं तक पहुंचे, इस दिशा में प्रयास जरूरी है। प्रदूषित नालों को जलस्रोतों में मिलने से रोका जाए। साफ , अविरल पानी अलग हो और गंदा पानी अलग, इसके प्रयास सरकारी ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी करने की जरूरत है।"

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